Sunday, August 14, 2011

बीते लम्हे गुज़रे पल

बीते लम्हे गुज़रे पल,
अक्सर मुझे याद आते हैं 
दूर हुए वो पल फिर क्यूँ 
वो मुझे इतना सताते हैं
उन लम्हों को सोचकर दिल फिर यूँ ही चीख उठता हैं 
कहने को थी कितनी बातें मगर तू सुन ना सकी मैं कह ना सका 

कह ना सका की तू कितनी खुबसूरत हैं
कह ना सका की मेरे लिए 
तेरी क्या अहमियत हैं
तेरी आँखों में जो संसार मैंने देखा
मुझे बस उस संसार में जीना हैं
नफरत कर लेना मुझसे ढेर सारी 
पहले चंद लम्हे मुझे मुझे तेरे प्यार में जीना हैं
उन लम्हों को महसूस कर दिल फिर यूँ ही चीख उठता हैं 
कहनी तो थी इतनी बातें मगर तू सुन ना सकी मैं कह ना सका 

मालूम हैं मुझे तू किसी और की अमानत हैं
चाहता तो ना था मगर जानू ना
 की तू कैसे बन गयी मेरी आदत हैं
याद हैं मुझे फुर्सत के वो पल
वो चांदनी रातें वो हसीं कल
वो ढेर सारी बातें कुछ हमारी कुछ तुम्हारी
उन बातों को सोचकर दिल फिर यूँ ही चीख उठता हैं 
कहनी तो थी कितनी बातें मगर तू सुन ना सकी मैं कह ना सका

काश कह दिया होता 
कितना दर्द हैं इस दिल में
काश कह दिया होता की
अकेला हूँ तेरे बिना इस भरी महफ़िल में
काश कहा होता 
की वो चाँद आधा सा 
कितना प्यारा लगता हैं
काश कहा होता वो ही सब 
जो मेरा दिल बार बार बकता हैं

दिल की बेकरारी को सोचकर चीख उठता हूँ 
कहनी तो थी कितनी बातें 
मगर मैं कह ना सका तू सुन ना सकी 
                                                                                                           ANI

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